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SARASVATI STAVAN | सरस्वती स्तवन

जगन्माता ख्याता, जिनवर मुखांभोज उदिता |
भवानी कल्याणी, मुनि मनुज मानी प्रमुदिता ||
महादेवी दुर्गा, दरणि दु:खदाई दुर्गति |
अनेका एकाकी, द्वययुत दशांगी जिनमती ||१||

कहें माता तो कों, यद्यपि सबही अनादिऽनिधना |
कथंचित् तो भी तू, उपजि विनशे यों विवरना ||
धरे नाना जन्म, प्रथम जिन के बाद अब लों |
भयो त्यों विच्छेद, प्रचुर तुव लाखों बरस लों ||२||

महावीर स्वामी, जब सकलज्ञानी मुनि भये |
बिडौजा के लाये, समवसृत में गौतम गये ||
तबै नौकारूपा, भव जलधि माँही अवतरी |
अरूपा निर्वर्णा, विगत भ्रम साँची सुखकरी ||३||

धरें हैं जे प्राणी, नित जननि तो कों हृदय में |
करें हैं पूजा व, मन वचन काया करि नमें ||
पढ़ावें देवें जो, लिखि-लिखि तथा ग्रन्थ लिखवा |
लहें ते निश्चय सों, अमर पदवी मोक्ष अथवा ||४||
।। इत्याशीर्वाद: पुष्पांजलिं क्षिपेत् ।।

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