Jain Deepavali Poojan | दीपावली पूजा 

Jain Deepavali Poojan | दीपावली पूजा

श्री ऋषभ देवाय नमः।।
श्री महावीराय नमः।।
श्री गौतम-गणधरायनमः।।
श्री जिन सरस्वत्यै नमः।।
श्री केवलज्ञान लक्ष्म्यै नमः।।

श्री शुभ मिति कार्तिक बदी ३०.. ।। वार् ।। दिनांक // ई. को शुभ बेला में दुकान श्री की बही का मुहूर्त किया

पूजा प्रारम्भ

मंगलाचरण
अर्हन्तो भगवन्त इन्द्रमहिता: सिद्धाश्च सिद्धीश्वरा:
आचार्या जिनशासनोन्नतिकरा पूज्या उपाध्यायका:
श्रीसिद्धान्तसुपाठका: मुनिवरा: रत्नत्रयाराधका:
पञ्चैते परमेष्ठिन: प्रतिदिनं कुर्वन्तु ते मंगलम्

ॐ जय जय जय नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु ।

णमो अरिहंताणं,
णमो सिद्धाणं,
णमो आइरियाणं,
णमो उवज्झायाणं,
णमो लोए सव्वसाहूणं।

चतत्तारि मंगलम, अरिहंता मंगलम,
सिद्धा मंगलम, साहू मंगलम्। 
केवलि पण्णत्तोधम्मो मंगलम्। 

चत्तारि लोगुत्तमा, अरिहंतालोगुत्तमा 
सिद्धा लोगुत्तमा, साहू लोगुत्तमा। 
केवलिपण्णत्तो धम्मोलोगुत्तमा |

चत्तारि सरणं पव्वज्जामि, अरिहंत सरणं पव्वज्जामि, 
सिद्धा सरणं पव्वज्जामि, साहूशरणं पव्वज्जामि, 
केवलिपण्णत्तं धम्मं सरणं पव्वज्जामि।

ॐ अनादि मूलमंत्रेभ्यो नमः
पुष्पांजलिं क्षिपेत

देव शास्त्र-गुरु पूजा का अर्घ
जल परम उज्जवल गन्ध अक्षत- पुष्प चरु धरुँ।
वर धूप निर्मल फल विविध बहु जनम के पातक हरुँ।।
इह भाँति अर्ध्य चढाय नित भवि करत शिव पंकति मचूँ।
अरहंत श्रुत सिद्धांत गुरु निर्ग्रंथ नित पूजा रचूँ।।
वसुविधि अर्ध्य संजोय कै, अति उछाहमन कीन्।
जासों पूजों परम पद, देवशास्त्र-गुरु तीन्।।
ॐ श्री देवशास्त्र गुरुभ्यो अनर्ध्यपद प्राप्तये अर्ध्यम निर्पामीति स्वाहा।

बीस महाराज का अर्घ
जल फल आठों द्रव्य संभार, रत्न जवाहर भर भर थार्।
नमूँ कर जोड, नित प्रति ध्याऊ भोरहिं भोर।।
पाँचों मेरु विदेह सुथान, तीर्थंकर जिन बीस महान।
नमूँ कर जोड नित प्रति ध्याऊ भोरहिं भोर।।
ॐ ह्रीं श्री विदेहक्षेत्रस्य सीमन्धरादि विद्यमांर्विर्शति तीर्थंकरेभ्यो अर्ध्यम निर्वपामीति स्वाहा ।।

सिद्ध पर्मेष्ठी का अर्घ
जल फल वसु वृन्दा, अरघ अमन्दा, जजत अनन्दा के कन्दा।
मेटे भवफन्दा, सब दुःख दन्दा, हीराचन्दा तुम बन्दा।।
त्रिभुवन के स्वामी, त्रिभुवन, नामी, अंतरजामी अभिरामी।
शिवपुर विश्रामी, निज निधिपामी सिद्धजजामी सिरनामी।।
ॐ ह्रीं श्री अनाहत परक्रमाय सर्वकर्म विनिर्मुक्ताय सिद्धपरमेष्ठिने अर्घ्यम निर्वपामीति स्वाहा।

तीस चौबीसी का अर्घ
द्रव्य आठो, जू लीना हैं, अर्घ कर में नवीना हैं ।
पुजतां पाप छीना हैं, भानुमल जोड़ किना हैं ॥
दीप अढ़ाई सरस राजै, क्षेत्र दस ताँ विषै छाजै ।
सातशत बीस जिनराजे, पुजतां पाप सब भाजै ॥
ॐ ह्रीं पञ्चभरत-पंचैरावत-सम्बन्धी-दशक्षेत्रान्तर्गत-भुत-भविष्यत्-वर्तमान-सम्बन्धी-तीस-चौबीसी के सात सौ बीस जिनेंद्रेभ्यो-अर्घय्म निर्वपामिति स्वाहा ||      

चौबीस महाराज का अर्घ
फलफल आठों शुचिसार, ताको अर्घ करों।
तुमको अरपों भवतार, भवतरि मोक्ष वरों।।
चौबीसों श्री जिनचन्द, आनन्द कन्द सही।
पदजजत हरत भव फन्द, पावक मोक्षमही।।
ॐ ह्रीं श्री वृषभादि वीरांत चतुर्विंशति तिर्थंकरेभ्यो अनर्घ-पद प्राप्तये अर्घ्यम निर्वपामीति स्वाहा ||

श्री महावीर अर्घ
जल फल वसु सजि हिम थार, तनमन मोद धरों।
गुण गाऊ भवदधितार, पूजत पाप हरों।।
श्रीवीर महा अतिवीर, सन्मति नायक हो।
जय वर्द्धमान गुणधीर, सन्मतिदायक हो।।
ॐ ह्रीं श्री महावीर जिनेन्द्राय अर्ध्यम निर्वपामीति स्वाहा।

अंतरायकर्म नाशार्थ अर्घ
लाभ की अंतराय के वस जीवसु न लहै।
जो करै कष्ट उत्पात सगरे कर्मवस विरथा रहै।।
नहीं जोर वाको चले इक छिन दीन सौ जग में फिरै।
अरिहंत सिद्ध अधर धरिकै लाभ यौ कर्म कौ हरै।।
ॐ ह्रीं लाभांतरायकर्म रहिताभ्याम अहर्तसिद्ध परमेष्ठिभ्याम अर्घ्यम निर्वपामीति स्वाहा।
पुष्पांजलिं क्षिपेत

श्री जिनवाणी पूजा

जनम जरा मृतु, क्षय करै, हरै कुनय जड रीति;
भव सगरसों ले तिरै, पूजै जिन वच प्रीति.
ॐ ह्रीं श्री जिन मुखोद्भ्व सरस्वत्यै पुष्पांजलि निर्वपामीति स्वाहा.

छीरो दधि गंगा विमल, तरंगा सलिल, अभंगा, सुख संगा;
भरि कंचन झारी, धारी निकारी, तृषा निवारी, हित चंगा.
तीर्थंकर की ध्वनि, गण धर ने सुनि, अंग रचे चुनि ज्ञान मई;
सो जिनवर वानी, शिव सुख दानी, त्रिभुवन-मानी पूज्य भई.
ॐ ह्रीं श्री जिन मुखोद्भ्व सरस्वती-देव्यै जलं निर्वपामीति स्वाहा.

कर-पूर मंगाया चन्दन आया, केशर लाया रंग भरी;
शारत-पद वंदो, मन अभिनंदों, पाप निकंदो दाह हरी.
तीर्थंकर की ध्वनि, गण धर ने सुनि, अंग रचे चुनि ज्ञान मई;
सो जिनवर वानी, शिव सुख दानी, त्रिभुवन-मानी पूज्य भई.
ॐ ह्रीं श्री जिन मुखोद्भ्व सरस्वती देव्यै चंदनम् निर्वपामीति स्वाहा.

सुख दास कमोदं, धारक मोदं अति अनु मोदं चंद-समं;
बहु भक्ति बढ़ाई, कीरति गाई, होहु सहाई, मात ममं.
तीर्थंकर की ध्वनि, गण धर ने सुनि, अंग रचे चुनि ज्ञान मई;
सो जिनवर वानी, शिव सुख दानी, त्रिभुवन-मानी पूज्य भई.
ॐ ह्रीं श्री जिन मुखोद्भ्व सरस्वती देव्यै अक्षतान निर्वपामीति स्वाहा.

बहु फूल सुवासं, विमल प्रकाशं, आनंद रासं लाय धरे;
मम काम मिटायो, शील बढ़ायो, सुख उपजायो दोष हरे.
तीर्थंकर की ध्वनि, गण धर ने सुनि, अंग रचे चुनि ज्ञान मई;
सो जिनवर वानी, शिव सुख दानी, त्रिभुवन-मानी पूज्य भई.
ॐ ह्रीं श्री जिन मुखोद्भ्व सरस्वती देव्यै पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा.

पकवान बनाया, बहु धृत लाया, सब विध भाया मिष्ठ महा;
पजुं थुति गाऊं, प्रीति बढ़ाऊं, क्षुधा नशाऊं हर्ष लहा.
तीर्थंकर की ध्वनि, गण धर ने सुनि, अंग रचे चुनि ज्ञान मई;
सो जिनवर वानी, शिव सुख दानी, त्रिभुवन-मानी पूज्य भई.
ॐ ह्रीं श्री जिन मुखोद्भ्व सरस्वती देव्यै नैवेध्यम निर्वपामीति स्वाहा.

कर दीपक जोतं, तन क्षय होतं, ज्योति उदोतं तुमहिं चढ़ै;
तुम हो परकाशक, भरम विनाशक हम घट भासक ज्ञान बढ़ै.
तीर्थंकर की ध्वनि, गण धर ने सुनि, अंग रचे चुनि ज्ञान मई;
सो जिनवर वानी, शिव सुख दानी, त्रिभुवन-मानी पूज्य भई.
ॐ ह्रीं श्री जिन मुखोद्भ्व सरस्वती देव्यै दीपं निर्वपामीति स्वाहा.

शुभ गंध दशोंकर, पाव कमें धर, धूप मनोहर खेवत हैं;
सब पाप जलावे,पुण्य कमावे, दास कहावे सेवत हैं.
तीर्थंकर की ध्वनि, गण धर ने सुनि, अंग रचे चुनि ज्ञान मई;
सो जिनवर वानी, शिव सुख दानी, त्रिभुवन-मानी पूज्य भई.
ॐ ह्रीं श्री जिन मुखोद्भ्व सरस्वती देव्यै धूपम् निर्वपामीति स्वाहा.

बादाम छुहारी, लोंग सुपारी, श्री फल भारी ल्यावत हैं;
मन वांछित दाता मेट असाता, तुम गुन माता, ध्यावत हैं.
तीर्थंकर की ध्वनि, गण धर ने सुनि, अंग रचे चुनि ज्ञान मई;
सो जिनवर वानी, शिव सुख दानी, त्रिभुवन-मानी पूज्य भई.
ॐ ह्रीं श्री जिन मुखोद्भ्व सरस्वती देव्यै फलम् निर्वपामीति स्वाहा.

नयनन सुख कारी, मृदु गुन धारी, उज्जवल भारी, मोल धरैं;
शुभ गंध सम्हारा, वसन निहारा, तुम तन धारा ज्ञान करैं.
तीर्थंकर की ध्वनि, गण धर ने सुनि, अंग रचे चुनि ज्ञान मई;
सो जिनवर वानी, शिव सुख दानी, त्रिभुवन-मानी पूज्य भई.
ॐ ह्रीं श्री जिन मुखोद्भ्व सरस्वती देव्यै अर्घ्यम् निर्वपामीति स्वाहा.

जल चंदन अक्षत फल चरु, अरु दीप धूप अति फल लावै;
पूजा को ठानत जो तुम जानत, सो नर द्यानत सुख पावै.
तीर्थंकर की ध्वनि, गण धर ने सुनि, अंग रचे चुनि ज्ञान मई;
सो जिनवर वानी, शिव सुख दानी, त्रिभुवन-मानी पूज्य भई.
ॐ ह्रीं श्री जिन मुखोद्भ्व सरस्वती देव्यै अर्घ्यम् निर्वपामीति स्वाहा.

जयमाला 
ओंकार ध्वनि सार, द्वाद-शांग वाणी विमल;
नमों भक्ति उर धार, ज्ञान करै जड़ता हरै.
पहलो आचा रंग बखानो, पद अष्टा-दश सहस प्रमानो;
 दूजो सूत्र कृतं अभिलाष, पद छत्तीस सहस गुरु भाषं.
तीजो ठाना अंग सुजानं, सहस बयालिस पद सरधानं;
 चौथो सम वायांग निहारं, चौसठ सहस लाख इक धारम्.
पंचम व्याख्या प्रज्ञप्ति दरसं, दोय लाख अटठाइस सहसं;
 छटठो ज्ञातृ कथा विस्तारं, पांच लाख छप्पन हज्जारं.
सप्तम उपास काध्य नंगं, सत्तर सहस ग्यार लख भंगं;
अष्टम अंत कृत दस ईसं, सहस अठाइस लाख तेईसं.
नवम अनुत्तर दश सुविशालं, लाख बानवै सहस चवालं;
 दशम प्रश्न व्याकरण विचारं, लाख तिरानव सोल हजारं.
ग्यारस सूत्र विपाक सु भाखं, एक कोड चौरासी लाखं;
चार कोड़ि अरु पंद्रह लाखं, दो हजार सब पद गुरु शाखं.
द्वादश दृष्टि वाद पन भेदं, इक सो आठ कोड़ि पन वेदं;
अड़सठ लाख सहस छप्पन हैं, सहित पंच पद मिथ्या हन हैं.
इक सौ बारह कोड़ि बखानो, लाख तिरासी ऊपर जानो;
 ठावन सहस पंच अधिकाने, द्वादश अंग सर्व पद माने.
साढ़े इकावन आठ हि लाखं, सहस चुरासी छह सौ भाखं;
 साढ़े इकीस श्लोक बताये, एक एक पद के ये गाये.

दोहा
जा बानी के ज्ञान ते, सूझे लोक अलोक;
ज्ञानत जग जय-वंत हो, सदा देत हूँ धोक.
ॐ ह्रीं श्री जिन मुखोद्भ्व सरस्वती देव्यै महार्घ्यम् निर्वपामीति स्वाहा.

श्री गौतम गणधर पूजा
श्री गौतम गणईश शीष यह तुम्हे नमा कर
आव्हानन अब करूँ आय तिष्ठो मानस पर।
पाके केवल ज्योति ज्ञाननिधि हुए गुणाकर।
निज लक्ष्मी का दान करो मेरे घट आ कर।
श्री गौतम गण ईश जी तिष्ठो मम उर आय।
ज्ञान-लक्ष्मी पति बने, मेरी मानव काय।
ॐ ह्रीं कार्तिक कृष्णामावस्यायां कैवल्यलक्ष्मी प्राप्त श्री गौतमगणधराय पुष्पांजलिः।

गांगेय वारि शुचि प्रासुक दिव्य ज्योति।
जन्मादि कष्ट निज वारण को लिया ये।
संसार के अखिल त्रास निवारने को
योगीन्द्र गौतम पदाम्बुज में चढाता।
ॐ ह्रीं कार्तिक कृष्णामावस्यायां कैवल्यलक्ष्मी प्राप्तये श्री गौतम गणधराय जलं निर्वपामीति स्वाहा।

कर्पूर युक्त मलयागिर को घिसाया
संसार ताप शमनार्थ इसे बनाया
संसार के अखिल त्रास निवारने को
योगीन्द्र गौतम पदाम्बुज में चढाता।
ॐ ह्रीं कार्तिक कृष्णामावस्यायां कैवल्यलक्ष्मी प्राप्तये श्री गौतम गणधराय सुगन्धं निर्वपामीति स्वाहा।

मुक्ताभ अक्षत सुगन्धि चुना चुना के,
व्याधिध्न अक्षत-पदार्थ सजा सजा के।
संसार के अखिल त्रास निवारने को
योगीन्द्र गौतम पदाम्बुज में चढाता।
ॐ ह्रीं कार्तिक कृष्णामावस्यायां कैवल्यलक्ष्मी प्राप्तये श्री गौतम गणधराय अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।

कन्दर्प दर्प दलनार्थ नवीन ताजे,
बेला गुलाब मच्कुन्द सु पार्जाती।
संसार के अखिल त्रास निवारने को
योगीन्द्र गौतमपदाम्बुजमें चढाता।
ॐ ह्रीं कार्तिक कृष्णामावस्यायां कैवल्यलक्ष्मी प्राप्तये श्री गौतम गणधराय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।

क्षीरादि मिश्रित अमीघ बल प्रदाता,
पक्कान्न थाल यह भूख निवारने को।
संसार के अखिल त्रास निवारने को
योगीन्द्र गौतम पदाम्बुज में चढाता।
ॐ ह्रीं कार्तिक कृष्णामावस्यायां कैवल्यलक्ष्मी प्राप्तये श्री गौतम गणधराय नैवेद्यम निर्वपामीति स्वाहा।

रत्नादि दीप नवज्योति कपूर वर्ती,
उद्दाम-मोह-तम- तोम सभी हटाने।
संसार के अखिल त्रास निवारने को
योगीन्द्र गौतम पदाम्बुज में चढाता।
ॐ ह्रीं कार्तिक कृष्णामावस्यायां कैवल्यलक्ष्मी प्राप्तये श्री गौतम गणधराय दीपम निर्वपामीति स्वाहा।

अज्ञान मोह मद से भव में भ्रमाता,
ये दुष्ट कर्म, तिस नाशन को दशांगी।
संसार के अखिल त्रास निवारने को
योगीन्द्र गौतम पदाम्बुज में चढाता।
ॐ ह्रीं कार्तिक कृष्णामावस्यायां कैवल्यलक्ष्मी प्राप्तये श्री गौतम गणधराय धूपम निर्वपामीति स्वाहा।

केला अनार सह्कार सुपक्क जामू,
ये सिद्धमिष्ठ फल मोक्षफलाप्ति को मैं।
संसार के अखिल त्रास निवारने को
योगीन्द्र गौतम पदाम्बुज में चढाता।
ॐ ह्रीं कार्तिक कृष्णामावस्यायां कैवल्यलक्ष्मी प्राप्तये श्री गौतम गणधराय फलम निर्वपामीति स्वाहा।

पानीय आदि वसु द्रव्य सुगन्धयुक्त,
लाया प्रशांत मन से निज रूप पाने।
संसार के अखिल त्रास निवारने को
योगीन्द्र गौतम पदाम्बुज में चढाता।
ॐ ह्रीं कार्तिक कृष्णामावस्यायां कैवल्यलक्ष्मी प्राप्तये श्री गौतम गणधराय अर्ध्यम निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला

वीर जिनेश्वर के प्रथम गणधर-गौतम-पांय।
नमन करुँ कर जोडकर स्वर्ग मोक्ष फल दाय।।
हरिगीत्तिका
जय देव श्रीगौतम गणेश्वर्। प्रार्थना तुमसे करूँ।
सब हटा दो कष्ट मेरे अर्घ ले आरती करूँ।
हे गणेश। कृपा करो, अब आत्म ज्योति पसार दो।
हम हैं तुम्हारे सदय हो दुर्वासनायें मार दो।
वीर प्रभुनिर्वाण-क्षण में था सम्हाला आपने।
अब चोड तुमको जाउँ कहँ घेरा चहूँ दिशि पाप ने।
है दिवस वह ही नाथ। स्वामीवीर के निर्वाण का।
जग के हितैषी बिज्ञ गौतम ईष केवल ज्ञान का।
नाथ। अब कर के कृपा हम्को सहारा दीजिये।
दीपमाला-आरती पूजा गृहम मम कीजिये।
दीपमाला-आरती पूजा गृहण मम कीजिये।
ॐ ह्रीं कार्तिक कृष्णामावस्यायां कैवल्यलक्ष्मी प्राप्तये श्री गौतम गणधराय अर्ध्यम निर्वपामीति स्वाहा।

ज्योति पुंज गणपति प्रभो। दूर करो अज्ञान
समता रस से सिक्त हो नया उगे उर भानु।।
पुष्पांजलिं क्षिपेत

श्री महावीर स्वामी की आरती
जय महावीर प्रभो, स्वामी जय महावीर प्रभो।
कुण्डलपुर अवतारी, त्रिशलानन्द विभो।। ॐ जय महावीर.
सिद्धार्थ घर जन्मे, वैभवथा भारी।
बाल ब्रह्मचारी व्रत पाल्यौ, तपधारी।। ॐ जय महावीर.
आतम ज्ञान विरागी, सम दृष्टिधारी।
माया मोह विनाशक, ज्ञान ज्योतिजारी।। ॐ जय महावीर.
जग में पाठ अहिंसा, आपहि विस्तार्यौ।
हिंसा पाप मिटा कर, सुधर्म परचारयौ।। ॐ जय महावीर.
यहि विधि चाँदनपुर में,अतिशय दर्शायौ।
ग्वाल मनोरथ पूर्यो, दूध गाय पायौ।। ॐ जय महावीर.
प्राणदान मंत्री को, तुमने प्रभु दीना।
मन्दिर तीन शिखर का निर्मित है कीना।। ॐ जय महावीर.
जयपुर नृप भी तेरे, अतिशय के सेवी।
एक ग्राम तिन दीनों, सेवा हित यह भी।। ॐ जय महावीर.
जो कोइ तेरे दर पर इच्छा कर आवे।
धन, सुत सब कुछ पावे संकट मिट जावे।। ॐ जय महावीर.
निश दिन प्रभु मन्दिर में जगमग ज्योति करै।
हरिप्रसाद चरणों में, आनन्द मोद भरैं।। ॐ जय महावीर.

Image Source:
'Barnstar 2.0 for Wp:jainism' by Wegates, licensed under CC BY-SA 4.0

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