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भूपाल चतुर्विंशतिका (हिन्दी) || BHUPAL CHATURVINSHATIKA (Hindi)

(दोहा)

सकल सुरासुर-पूज्य नित, सकलसिद्धि-दातार|
जिन-पद वंदूँ जोर कर, अशरन-जन-आधार ||१||

(चौपाई)

श्री सुख-वास-मही कुलधाम, कीरति-हर्षण-थल अभिराम |
सरसुति के रतिमहल महान्, जय-जुवती को खेलन-थान ||
अरुण वरण वाँछित वरदाय, जगत्-पूज्य ऐसे जिन पाय |
दर्शन प्राप्त करे जो कोय, सब शिवनाथ सो जन होय ||१||

निर्विकार तुम सोम शरीर, श्रवण सुखद वाणी गभ्भीर |
तुम आचरण जगत् में सार, सब जीवन को है हितकार ||
महानिंद भव मारु देश, तहाँ तुंग तरु तुम परमेश |
सघन-छाँहि-मंडित छवि देत, तुम पंडित सेवें सुख-हेत ||२||

गर्भकूपतें निकस्यो आज, अब लोचन उघरे जिनराज |
मेरो जन्म सफल भयो अबै, शिवकारण तुम देखे जबै ||
जग-जन-नैन-कमल-वनखंड, विकसावन शशि शोक विहंड |
आनंदकरन प्रभा तुम तणी, सोई अमी झरन चाँदणी ||३||

सब सुरेन्द्र शेखर शुभ रैन, तुम आसन तट माणक ऐन |
दोऊँ दुति मिल झलकें जोर, मानों दीपमाल दुहँ ओर ||
यह संपति अरु यह अनचाह, कहाँ सर्वज्ञानी शिवनाह |
ता तें प्रभुता है जगमाँहिं, सही असम है संशय नाहिं ||४||

सुरपति आन अखंडित बहै, तृण जिमि राज तज्यो तुम वहै |
जिन छिन में जगमहिमा दली, जीत्यो मोहशत्रु महाबली ||
लोकालोक अनंत अशेख, कीनो अंत ज्ञानसों देख |
प्रभु-प्रभाव यह अद्भुत सबै, अवर देव में भूल न फबै ||५||

पात्रदान तिन दिन-दिन दियो, तिन चिरकाल महातप कियो |
बहुविध पूजाकारक वही, सर्व शील पाले उन सही ||
और अनेक अमल गुणरास, प्रापति आय भये सब तास |
जिन तुम सरधा सों कर टेक ,दृग-वल्लभ देखे छिन एक ||६||

त्रिजग-तिलक तुम गुणगण जेह, भवन-भुजंग-विषहर-मणि तेह |
जो उर-कानन माँहि सदीव, भूषण कर पहरे भवि-जीव ||
सोई महामती संसार, सो श्रुतसागर पहुँचे पार |
सकल-लोक में शोभा लहैं, महिमा जाग जगत् में वहै ||७||

(दोहा)

सुर-समूह ढोरें चमर, चंदकिरण-द्युति जेम |
नवतन-वधू-कटाक्षतें, चपल चलैं अति एम ||
छिन-छिन ढलकें स्वामि पर, सोहत ऐसो भाव |
किधौं कहत सिधि-लच्छि सों, जिनपति के ढिंग आव ||८||

(चौपाई छन्द १५ मात्रा)

शीश छत्र सिंहासन तलै, दिपै देह दुति चामर ढुरैं |
बाजे दुंदुभि बरसैं फूल, ढिंग अशोक वाणी सुखमूल ||
इहविधि अनुपम शोभा मान, सुर-नर सभा पदमनी भान |
लोकनाथ वंदें सिरनाय, सो हम शरण होहु जिनराय ||९||

सुर-गजदंत कमल-वन-माँहिं, सुरनारी-गण नाचत जाँहि |
बहुविधि बाजे बाजैं थोक, सुन उछाह उपजै तिहुँलोक ||
हर्षत हरि जै जै उच्चरै, सुमनमाल अपछर कर धरै |
यों जन्मादि समय तुम होय, जयो देव देवागम सोय ||१०||

तोष बढ़ावन तुम मुखचंद, जन नयनामृत करन अमंद |
सुन्दर दुतिकर अधिक उजास, तीन भुवन नहिं उपमा तास ||
ताहि निरखि सनयन हम भये, लोचन आज सुफल कर लये |
देखन-योग जगत् में देख, उमग्यो उर आनंद-विशेष ||११||

कैयक यों मानैं मतिमंद, विजित-काम विधि-ईश मुकंद |
ये तो हैं वनिता-वश दीन, काम-कटक-जीतन-बलहीन ||
प्रभु आगैं सुर-कामिनि करैं, ते कटाक्ष सब खाली परैं |
यातैं मदन-विध्वंसन वीर, तुम भगवंत और नहिं धीर ||१२||

दर्शन-प्रीति हिये जब जगी, तबै आम्र-कोपल बहु लगी |
तुम समीप उठ आवन ठयो, तब सों सघन प्रफुल्लित भयो ||
अबहूँ निज नैनन ढिंग आय, मुख मयंक देख्यो जगराय |
मेरो पुन्य विरख इहबार, सुफल फल्यो सब सुखदातार ||१३||

(दोहा)

त्रिभुवन-वन में विस्तरी, काम-दावानल जोर |
वाणी-वरषाभरण सों, शांति करहु चहुँ ओर ||
इंद्र मोर नाचै निकट, भक्ति भाव धर मोह |
मेघ सघन चौबीस जिन, जैवंते जग होय ||१४||

(चौपाई)

भविजन-कुमुदचंद सुखदैन, सुर-नरनाथ प्रमुख-जग जैन |
ते तुम देख रमैं इह भाँत, पहुप गेह लह ज्यों अलि पाँत ||
सिर धर अंजुलि भक्ति समेत, श्रीगृह प्रति परिदक्षण देत |
शिवसुख की सी प्रापति भई, चरण छाँहसों भव-तप गई ||१५||

वह तुम-पद-नख-दर्पण देव, परम पूज्य सुन्दर स्वयमेव |
तामें जो भवि भाग विशाल, आनन अवलोकै चिरकाल ||
कमला की रति काँति अनूप, धीरज प्रमुख सकल सुखरूप |
वे जग मंगल कौन महान्, जो न लहै वह पुरुष प्रधान ||१६||

इंद्रादिक श्रीगंगा जेह, उत्पति थान हिमाचल येह |
जिन-मुद्रा-मंडित अति-लसै, हर्ष होय देखे दु:ख नसै ||
शिखर ध्वजागण सोहैं एम, धर्म सुतरुवर पल्लव जेम |
यों अनेक उपमा-आधार, जयो जिनेश जिनालय सार ||१७||

शीस नवाय नमत सुरनार, केश-कांति-मिश्रित मनहार |
नख-उद्योत-वरतैं जिनराज, दशदिश-पूरित किरण-समाज ||
स्वर्ग-नाग-नर नायक संग, पूजत पाय-पद्म अतुलंग |
दुष्ट कर्मदल दलन सुजान, जैवंतो वरतो भगवान् ||१८||

सो कर जागै जो धीमान, पंडित सुधी सुमुख गुणगान |
आपन मंगल-हेत प्रशस्त, अवलोकन चाहैं कछु वस्त ||
और वस्तु देखें किस काज, जो तुम मुख राजै जिनराज |
तीन-लोक को मंगल-थान, प्रेक्षणीय तिहुँ जग-कल्यान ||१९||

धर्मोदय तापस-गृह कीर, काव्यबंध वन पिक तुम वीर |
मोक्ष-मल्लिका मधुप रसाल, पुन्यकथा कज सरसि मराल ||
तुम जिनदेव सुगुण मणिमाल, सर्व-हितंकर दीनदयाल |
ताको कौन न उन्नतकाय, धरै किरीट-मांहि हर्षाय ||२०||

केई वाँछैं शिवपुर-वास, केई करैं स्वर्ग सुख आस |
पचै पंचानल आदिक ठान, दु:ख बँधै जस बँधै अयान ||
हम श्रीमुख-वानी अनुभवैं, सरधा पूरव हिरदै ठवैं |
तिस प्रभाव आनंदित रहैं, स्वर्गादि सुख सहजे लहैं ||२१||

न्होन महोच्छव इन्द्रन कियो, सुरतिय मिल मंगल पढ़ लियो |
सुयश शरद-चंद्रोपम सेत, सो गंधर्व गान कर लेत ||
और भक्ति जो जो जिस जोग, शेष सुरन कीनी सुनियोग |
अब प्रभु करैं कौन-सी सेव, हम चित भयो हिंडोला एव ||२२||

जिनवर-जन्मकल्यानक द्योस, इंद्र आप नाचै खो होस |
पुलकित अंग पिता-घर आय, नाचत विधि में महिमा पाय ||
अमरी बीन बजावै सार, धरी कुचाग्र करत झँकार |
इहिविधि कौतुक देख्यो जबै, औसर कौन कह सकै अबै ||२३||

श्रीपति-बिंब मनोहर एम, विकसत वदन कमलदल जेम |
ताहि हेर हरखे दृग दोय, कह न सकूँ इतनो सुख होय ||
तब सुर-संग कल्यानक-काल, प्रगटरूप जावै जगपाल |
इकटक दृष्टि एक चितलाय, वह आनंद कहा क्यों जाय ||२४||

देख्यो देव रसायन-धाम, देख्यो नव-निधि को विसराम |
चिंतारयन सिद्धिरस अबै, जिनगृह देखत देखे सबै ||
अथवा इन देखे कछु नाहिं, यम अनुगामी फल जगमाँहिं |
स्वामी सरयो अपूरव काज, मुक्ति समीप भई मुझ आज ||25||

अब विनवै भूपाल नरेश, देखे जिनवर हरन कलेश |
नेत्र कमल विकसे जगचंद्र, चतुर चकोर करण आनंद ||
थुति जल सोंयों पावन भयो, पाप-ताप मेरो मिट गयो |
मो चित है तुम चरणन-माहिं, फिर दर्शन हूज्यो अब जाहिं ||२६||

(छप्पय छन्द)

इहिविधि बुद्धिविशाल राय भूपाल महाकवि |
कियो ललित-थुति-पाठ हिये सब समझ सकै नवि ||
टीका के अनुसार अर्थ कछु मन में आयो |
कहीं शब्द कहिं भाव जोड़ भाषा जस गायो ||
आतम पवित्र-कारण किमपि, बाल-ख्याल सो जानियो |
लीज्यो सुधार ‘भूधर’ तणी, यह विनती बुध मानियो ||२७||

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