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बड़ागाँव पार्श्वनाथ जिन चालीसा | Badagaon Parshwanath jin Chalisa

(दोहा)

बड़ागाँव अतिशय बड़ा, बनते बिगड़े काज ।

तीन लोक तीरथ नमहुँ, पार्श्व प्रभु महाराज ।।१।।


आदि-चन्द्र-विमलेश-नमि, पारस-वीरा ध्याय ।

स्याद्वाद जिन-धर्म नमि, सुमति गुरु शिरनाय ।।२।।



(मुक्त छन्द)

भारत वसुधा पर वसु गुण सह, गुणिजन शाश्वत राज रहे ।

सबकल्याणक तीर्थ-मूर्ति सह, पंचपरम पद साज रहे ।।१।।


खाण्डव वन की उत्तर भूमी, हस्तिनापुर लग भाती है ।

धरा-धन्य रत्नों से भूषित, देहली पास सुहाती है ।।२।।


अर्धचक्रि रावण पंडित ने, आकर ध्यान लगाया था ।

अगणित विद्याओं का स्वामी, विद्याधर कहलाया था ।।३।।


आदि तीर्थंकर ऋषभदेव का, समवशरण मन भाया था ।

अगणित तीर्थंकर उपदेशी, भव्यों बोध कराया था ।।४।।


चन्द्रप्रभु अरु विमलनाथ का, यश-गौरव भी छाया था ।

पारसनाथ वीर प्रभुजी का, समोशरण लहराया था ।।५।।


बड़ागाँव की पावन-भूमी, यह इतिहास पुराना है ।

भव्यजनों ने करी साधना, मुक्ती का पैमाना है ।।६।।


काल परिणमन के चक्कर में, परिवर्तन बहुबार हुए ।

राजा नेक शूर-कवि-पण्डित, साधक भी क्रम वार हुए ।।७।।


जैन धर्म की ध्वजा धरा पर, आदिकाल से फहरायी ।

स्याद्वाद की सप्त-तरंगें, जन-मानस में लहरायी ।।८।।


बड़ागाँव जैनों का गढ़ था, देवों गढ़ा कहाता था ।

पाँचों पाण्डव का भी गहरा, इस भूमी से नाता था ।।९।।


पारस-टीला एक यहाँ पर, जन-आदर्श कहाता था ।

भक्त मुरादें पूरी होतीं, देवों सम यश पाता था ।।१०।।


टीले की ख्याती वायु सम, दिग्-दिगन्त में लहराई ।

अगणित चमत्कार अतिशय-युत, सुरगण ने महिमा गाई ।।११।।


शीशराम की सुन्दर धेनु, नित टीले पर आती थी ।

मौका पाकर दूध झराकर, भक्ति-भाव प्रगटाती थी ।।१२।।


ऐलक जी जब लखा नजारा, कैसी अद्भुत माया है ।

बिना निकाले दूध झर रहा, क्या देवों की छाया है ।।१३।।


टीले पर जब ध्यान लगाया, देवों ने आ बतलाया ।

पारस-प्रभु की अतिशय प्रतिमा, चमत्कार सुर दिखलाया ।।१४।।


भक्तगणों की भीड़ भावना, धैर्य बाँध भी फूट पड़ा ।

लगे खोदने टीले को सब, नागों का दल टूट पड़ा ।।१५।।


भयाकुलित लख भक्त-गणों को, नभ से मधुर-ध्वनी आयी ।

घबराओ मत पारस प्रतिमा, शनै: शनै: खोदो भाई ।।१६।।


ऐलक जी ने मंत्र शक्ति से, सारे विषधर विदा किये ।

णमोकार का जाप करा कर, पार्श्व-प्रभू के दर्श लिये ।।१७।।


अतिशय दिव्य सुशोभित प्रतिमा, लखते खुशियाँ लहराई ।

नाच उठे नर-नारि खुशी से, जय-जय ध्वनि भू नभ छाई ।।१८।।


मेला सा लग गया धरा, पारस प्रभु जय-जयकारे ।

मानव पशुगण की क्या गणना, भक्ती में सुरपति हारे ।।१९।।


जब-जब संकट में भक्तों ने, पारस प्रभु पुकारे हैं ।

जग-जीवन में साथ न कोई, प्रभुवर बने सहारे हैं ।।२०।।


बंजारों के बाजारों में, बड़ेगाँव की कीरत थी ।

लक्ष्मण सेठ बड़े व्यापारी, सेठ रत्न की सीरत थी ।।२१।।


अंग्रेजों ने अपराधी कह, झूठा दाग लगाया था ।

तोपों से उड़वाने का फिर, निर्दय हुकुम सुनाया था ।।२२।।


दुखी हृदय लक्ष्मण ने आकर, पारस-प्रभु से अर्ज करी ।

अगर सत्य हूँ हे निर्णायक, करवा दो प्रभु मुझे बरी ।।२३।।


कैसा अतिशय हुआ वहाँ पर, शीतल हुआ तोप गोला ।

गद-गद्-हृदय हुआ भक्तों का, उतर गया मिथ्या-चोला ।।२४।।


भक्त-देव आकर के प्रतिदिन, नूतन नृत्य दिखाते हैं ।

आपत्ति लख भक्तगणों पर, उनको धैर्य बंधाते हैं ।।२५।।


भूत-प्रेत जिन्दों की बाधा, जप करते कट जाती है ।

कैसी भी हो कठिन समस्या, अर्चे हल हो जाती है ।।२६।।


नेत्रहीन कतिपय भक्तों ने, नेत्र-भक्ति कर पाये हैं ।

कुष्ठ-रोग से मुक्त अनेकों, कंचन-काया भाये हैं ।।२७।।


दुख-दारिद्र ध्यान से मिटता, शत्रु मित्र बन जाते हैं ।

मिथ्या तिमिर भक्ति दीपक लख, स्वाभाविक छंट जाते हैं ।।२८।।


पारस कुइया का निर्मल जल, मन की तपन मिटाता है ।

चर्मरोग की उत्तम औषधि रोगी पी सुख पाता है ।।२९।।


तीन शतक पहले से महिमा, अधुना बनी यथावत् है ।

श्रद्धा-भक्ती भक्त शक्ति से, फल नित वरे तथावत् है ।।३०।।


स्वप्न सलोना दे श्रावक को, आदीश्वर प्रतिमा पायी ।

वसुधा-गर्भ मिले चन्दाप्रभु, विमल सन्मती गहरायी ।।३१।।


आदिनाथ का सुमिरन करके, आधि-व्याधि मिट जाती है ।

चन्दाप्रभु अर्चे छवि निर्मल, चन्दा सम मन भाती है ।।३२।।


विमलनाथ पूजन से विमला, स्वाभाविक मिल जाती है ।

पारस प्रभु पारस सम महिमा, वर्द्धमान सुख थाती है ।।३३।।


दिव्य मनोहर उच्च जिनालय समवशरण सह शोभित हैं ।

पंच जिनालय परमेश्वर के, भव्यों के मन मोहित हैं ।।३४।।


बनी धर्मशाला अति सुन्दर, मानस्तम्भ सुहाता है ।

आश्रम गुरुकुल विद्यालय यश, गौरव क्षेत्र बढ़ाता है ।।३५।।


यह स्याद्वाद का मुख्यालय, यह धर्म-ध्वजा फहराता है ।

सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चरण सह, मुक्ती-पथ दरशाता है ।।३६।।


तीन लोक तीरथ की रचना, ज्ञान ध्यान अनुभूति करो ।

गुरुकुल साँवलिया बाबाजी, जो माँगो दें अर्ज करो ।।३७।।


अगहन शुक्ला पंचमि गुरुदिन, विद्याभूषण शरण लही ।

स्याद्वाद गुरुकुल स्थापन, पच्चीसों चौबीस भई ।।३८।।


शिक्षा मंदिर औषधि शाला, बने साधना केन्द्र यहीं ।

दुख दारिद्र मिटे भक्तों का, अनशरणों की शरण सही ।।३९।।


स्वारथ जग नित-प्रति धोखे खा, सन्मति शरणा आये हैं ।

चूक माफ मनवांछित फल दो, स्याद्वाद गुण गाये हैं ।।४०।।


(दोहा)


हे पारस जग जीव हों, सुख सम्पति भरपूर ।

साम्यभाव ‘सन्मति’ रहे, भव दुख हो चकचूर ।।


कविश्री चंद्र

Image source:
'Parshwanath Jain Temple Khajuraho 10' by Antoine Taveneaux, image compressed, is licensed under CC BY-SA 3.0

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