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श्री तत्वार्थसूत्रम | Shree Tatvarthsutram

मोक्षमार्गस्य नेतारं भेत्तारं कर्मभूभृताम् ।

ज्ञातारं विश्वतत्त्वानां वंदे तद्गुणलब्धये ||

त्रैकाल्यं द्रव्य-षट्कं नव-पद-सहितं जीव-षट्काय-लेश्या: |

पंचान्ये चास्तिकाया व्रत-समिति-गति-ज्ञान-चारित्र-भेदा: ||

इत्येतन्मोक्षमूलं त्रिभुवन-महितै: प्रोक्तमर्हद्भिरीशै: |

प्रत्येति श्रद्धति स्पृशति च मतिमान् य: स वै शुद्धदृष्टि: ||१||

 

सिद्धे जयप्पसिद्धे चउव्विहाराहणा-फलं पत्ते |

वंदित्ता अरहंते वोच्छं आराहणा कमसो ||२||

 

उज्जोवणमुज्जवणं णिव्वाहणं साहणं च णिच्छरणं |

दंसण-णाण-चरित्तं तवाणमाराहणा भणिया ||३||

 

| | अध्याय - १ | |

सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्राणि मोक्षमार्ग: |१|

 

तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम् |२|

 

तन्निसर्गादधिगमाद्वा |३|

 

जीवाजीवास्रव- बन्ध-संवर-निर्जरा-मोक्षास्तत्त्वम् |४|

 

नाम-स्थापना-द्रव्य- भावतस्तन्न्यास: |५|

 

प्रमाणनयैरधिगम: |६|

 

निर्देश- स्वामित्व-साधनाधिकरण-स्थिति-विधानत: |७|

 

सत्संख्या- क्षेत्र-स्पर्शन-कालान्तर-भावाल्पबहुत्वैश्च |८|

 

मतिश्रुतावधि- मन:पर्यय-केवलानि ज्ञानम् |९|

 

तत्प्रमाणे |१०|

 

आद्ये परोक्षम् |११|

 

प्रत्यक्षमन्यत् |१२|

 

मति: स्मृति: संज्ञा चिन्ताऽभिनिबोध इत्यनर्थान्तरम् |१३|

 

तदिन्द्रियानिन्द्रिय-निमित्तम् |१४|

 

अवग्रहेहावाय-धारणा: |१५|

 

बहु-बहुविध- क्षिप्रानि:सृतानुक्त-ध्रुवाणां सेतराणाम् |१६|

 

अर्थस्य |१७|

 

व्यंजनस्यावग्रह: |१८|

 

न चक्षुरनिन्द्रियाभ्याम् |१९|

 

श्रुतं मतिपूर्वं द्वयनेकद्वादशभेदम् |२०|

 

भवप्रत्ययोऽवधिर्देव- नारकाणाम् |२१|

 

क्षयोपशमनिमित्त: षड्विकल्प: शेषाणाम् |२२|

 

ऋजु-विपुलमती मन:पर्यय: |२३|

 

विशुद्ध्यप्रतिपाताभ्यां तद्विशेष: |२४|

 

विशुद्धि-क्षेत्र-स्वामि-विषयेभ्योऽवधि-मन:पर्यययो: |२५|

 

मति-श्रुतयोर्निबन्धो द्रव्येष्वसर्व-पर्यायेषु |२६|

 

रूपिष्ववधे: |२७|

 

तदनन्तभागे मन:पर्ययस्य |२८|

 

सर्व-द्रव्य-पर्यायेषु केवलस्य |२९|

 

एकादीनि भाज्यानि युगपदेकस्मिन्नाचतुर्य् : |३०|

 

मति-श्रुतावधयो विपर्ययश्च |३१|

 

सदसतोरविशेषाद्यदृच्छोपलब्धेरुन्मत्तवत् |३२|

 

नैगम-संग्रह-व्यवहारर्जुसूत्र-शब्द-समभिरूढैवंभूता नया: |३३|

 

।। इति तत्त्वार्थसूत्रे मोक्षशास्त्रे प्रथमोऽध्याय: ।।१।।

| | अध्याय - २  | |

औपशमिक-क्षायिकौ भावौ मिश्रश्च जीवस्य स्वतत्त्वमौदयिक पारिणामिकौ च |१|

 

द्वि-नवाष्टादशैकविंशति-त्रिभेदा यथाक्रमम् |२|

 

सम्यक्त्व-चारित्रे |३|

 

ज्ञान-दर्शन-दान-लाभ- भोगोपभोग-वीर्याणि च |४|

 

ज्ञानाज्ञान-दर्शन-लब्ध्यश्चतुस्त्रि-त्रि-पंचभेदा: सम्यक्त्व-चारित्र-संयमासंयमाश्च |५|

 

गति-कषाय-लिंग-मिथ्यादर्शनाज्ञानासंयतासिद्धलेश्याश्चतुश्चतु- स्त्र्येकैकैकैक-षड्भेदा: |६|

 

जीव भव्याभव्यत्वानि च |७|

 

उपयोगो लक्षणम् |८|

 

स द्विविधोऽष्टचतुर्भेद: |९|

 

संसारिणो मुक्ताश्च |१०|

 

समनस्काऽमनस्का: |११|

 

संसारिणस्त्रस-स्थावरा: |१२|

 

पृथिव्यप्तेजो-वायु-वनस्पतय: स्थावरा: |१३|

 

द्वीन्द्रियादयस्त्रसा: |१४|

 

पंचेन्द्रियाणि |१५|

 

द्विविधानि |१६|

 

निर्वृत्युपकरणे द्रव्येन्द्रियम् |१७|

 

लब्ध्युपयोगौ भावेन्द्रियम् |१८|

 

स्पर्शन-रसन-घ्राण-चक्षु:-श्रोत्राणि |१९|

 

स्पर्श-रस-गन्ध-वर्ण-शब्दास्तदर्था: |२०|

 

श्रुतमनिन्द्रियस्य |२१|

 

वनस्पत्यन्तानामेकम् |२२|

 

कृमि-पिपीलिका-भ्रमर-मनुष्यादीनामेकैकवृद्धानि |२३|

 

संज्ञिन: समनस्का: |२४|

 

विग्रहगतौ कर्मयोग: |२५|

 

अनुश्रेणि गति: |२६|

 

अविग्रहा जीवस्य |२७|

 

विग्रहवती च संसारिण: प्राक् चतुर्भ्य: |२८|

 

एकसमयाऽविग्रहा |२९|

 

एकं द्वौ त्रीन्वानाहारक: |३०|

 

संमूर्च्छन-गर्भोपपादाजन्म |३१|

 

सचित्त-शीत-संवृता: सेतरा मिश्राश्चैकशस्तद्योनय: |३२|

 

जरायुजाण्डज-पोतानां गर्भ: |३३|

 

देवनारकाणामुपपाद: |34|

 

शेषाणां सम्मूर्च्छनम् |३५|

 

औदारिक-वैक्रियिकाहारक-तैजस-कार्मणानि शरीराणि |३६|

 

परं परं सूक्ष्मम् |३७|

 

प्रदेशतोऽसंख्येयगुणं प्राक् तैजसात् |३८|

 

अनन्तगुणे परे |३९|

 

अप्रतीघाते |४०|

 

अनादिसम्बन्धे च |४१|

 

सर्वस्य |४२|

 

तदादीनि भाज्यानि युगपदेकस्मिन्नाचतुर्भ्य: |४३|

 

निरुपभोगमन्त्यम् |४४|

 

गर्भसंमूर्च्छनजमाद्यम् |४५|

 

औपपादिकं वैक्रियिकम् |४६|

 

लब्धिप्रत्ययं च |४७|

 

तैजसमपि |४८|

 

शुभं विशुद्धमव्याघाति चाहारकं प्रमत्तसंयतस्यैव |४९|

 

नारक-सम्मूर्च्छिनो नपुंसकानि |५०|

 

न देवा: |५१|

 

शेषास्त्रिवेदा: |५२|

 

औपपादिक-चरमोत्तम-देहासंख्येयवर्षायुषोऽनपवर्त्यायुष: |५३|

 

।। इति तत्त्वार्थसूत्रे मोक्षशास्त्रे द्वितीयोऽध्याय: ।।२।।

| | अध्याय - ३  | |

रत्न-शर्करा-बालुका-पंक-धूम-तमो-महातम:प्रभा भूमयो घनाम्बुवाताकाशप्रतिष्ठा: सप्ताधोऽध: |१|

 

तासु त्रिंशत्पंचविंशति-पंचदश-दश-त्रि-पंचोनैक-नरक-शतसहस्राणि-पंच चैव यथाक्रमम् |२|

 

नारका नित्याशुभतर लेश्या परिणाम-देह-वेदना-विक्रिया: |३|

 

परस्परोदीरित-दु:खा: |४|

 

संक्लिष्टा-सुरोदीरित-दु:खाश्च प्राक् चतुर्यावि: i|५|

 

तेष्वेक-त्रि-सप्त-दश-सप्तदश-द्वाविंशति-त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमा सत्त्वानां परा स्थिति: |६|

 

जंबूद्वीप-लवणोदादय: शुभनामानो द्वीपसमुद्रा: |७|

 

द्विर्द्विर्विष्कम्भा: पूर्व-पूर्वपरिक्षेपिणो वलयाकृतय: |८|

 

तन्मध्ये मेरुनाभिर्वृत्तो योजन-शतसहस्र-विष्कम्भो जम्बूद्वीप: |९|

 

भरत-हैमवत-हरि-विदेह-रम्यक-हैरण्यवतैरावतवर्षा: क्षेत्राणि |१०|

 

तद्विभाजिन: पूर्वापरायता हिमवन्महाहिमवन्निषधनील-रुक्मिशिखरिणो वर्षधरपर्वता: |११|

 

हेमार्जुन-तपनीय-वैडूर्य-रजत-हेममया: |१२|

 

मणिविचित्रपार्श्वा उपरि मूले च तुल्यविस्तारा: |१३|

 

पद्म-महापद्म-तिगिंछ-केसरि-महापुंडरीक-पुंडरीका ह्रदास्तेषामुपरि |१४|

 

प्रथमो योजन-सहस्रायामस्तदर्द्धविष्कम्भो ह्रद: |१५|

 

दश-योजनावगाह: |१६|

 

तन्मध्ये योजनं पुष्करम् |१७|

 

तद्द्विगुण-द्विगुणा ह्रदा: पुष्कराणि च |१८|

 

तन्निवासिन्यो देव्य: श्री-ह्री-धृति-कीर्ति-बुद्धि-लक्ष्म्य: पल्योपमस्थितय: ससामानिकपरिषत्का: |१९|

 

गंगा-सिन्धु-रोहिद्रोहितास्या-हरिद्धरिकान्ता सीता-सीतोदा-नारी-नरकान्ता-सुवर्ण-रुप्यकूला-रक्ता-रक्तोदा: सरितस्तन्मध्यगा: |२०|

 

द्वयोर्द्वयो: पूर्वा: पूर्वगा: |२१|

 

शेषास्त्वपरगा: |२२|

 

चतुर्दश-नदी-सहस्र-परिवृता गंगा-सिन्ध्वादयो नद्य: |२३|

 

भरत: षड्विंश-पंच-योजन-शत-विस्तार: षट् चैकोनविंशति-भागा योजनस्य |२४|

 

तद् द्विगुण-द्विगुण-विस्तारा वर्षधर-वर्षा विदेहान्ता: |२५|

 

उत्तरा दक्षिण-तुल्या: |२६|

भरतैरावतयोर्वद्धिह्रासौ षट्समयाभ्यामुत्सर्पिण्यवसर्पिणीभ्याम् |२७|

 

ताभ्यामपरा भूमयोऽवस्थिता: |२८|

 

एक-द्वि-त्रि-पल्योपम-स्थितयो हैमवतक-हारिवर्षक-दैवकुरवका: |२९|

 

तथोत्तरा: |३०|

 

विदेहेषु संख्येयकाला: |३१|

 

भरतस्य विष्कम्भो जम्बूद्वीपस्य नवतिशतभाग: |३२|

 

द्विर्धातकीखंडे |३३|

 

पुष्करार्द्धे च |34|

 

प्राड़्मानुषोत्तरान्मनुष्या: |३५|

 

आर्या म्लेच्छाश्च |३६|

 

भरतैरावत-विदेहा: कर्मभूमयोऽन्यत्र देवकुरूत्तरकुरुभ्य: |३७|

 

नृस्थिती परावरे त्रिपल्योपमान्तर्मुहूर्ते |३८|

 

तिर्यग्योनिजानां च |३९|

 

।। इति तत्त्वार्थसूत्रे मोक्षशास्त्रे तृतीयोऽध्याय: ।।३।।

| | अध्याय - ४  | |

देवाश्चतुर्णिकाया: |१|

 

आदितस्त्रिषु पीतान्तलेश्या: |२|

 

दशाष्ट-पंच-द्वादशविकल्पा: कल्पोपपन्नपर्यन्ता: |३|

 

इन्द्र-सामानिक-त्रायस्त्रिंश-पारिषदात्मरक्ष-लोकपालानीक-प्रकीर्णकाभियोग्य किल्विषिकाश्चैकश: |४|

 

त्रायस्त्रिंशलोकपालवर्याik व्यन्तरज्योतिष्का: |५|

 

पूर्वयोर्द्वीन्द्रा: |६|

 

कायप्रवीचारा आ ऐशानात् |७|

 

शेषा: स्पर्श-रूप-शब्द-मन: प्रवीचारा: |८|

 

परेऽप्रवीचारा: |९|

 

भवनवासिनोऽसुर-नाग-विद्युत्सुपर्णाग्नि-वात-स्तनितोदधि-द्वीप-दिक्कुमारा: |१०|

 

व्यन्तरा: किन्नर-किंपुरुष-महोरग-गन्धर्व-यक्ष-राक्षस-भूत-पिशाचा: |११|

 

ज्योतिष्का: सूर्याचन्द्रमसौ ग्रह-नक्षत्र-प्रकीर्णक-तारकाश्च |१२|

 

मेरुप्रदक्षिणा नित्यगतयो नृलोके |१३|

 

तत्कृत: काल-विभाग: |१४|

 

बहिरवस्थिता: |१५|

 

वैमानिका: |१६|

 

कल्पोपपन्ना: कल्पातीताश्च |१७|

 

उपर्युपरि |१८|

 

सौधर्मैशान-सानत्कुमार-माहेन्द्र-ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर-लान्तव-कापिष्ठ-शुक्र-महाशुक्र-शतार-सहस्रारेष्वानत-प्राणतयोरारणाच्युतयोर्नवसु ग्रैवेयकेषु विजय-वैजयन्त-जयन्तापराजितेषु सर्वार्थसिद्धौ च |१९|

 

स्थिति-प्रभाव-सुख-द्युति-लेश्या-विशुद्धीन्द्रियावधि-विषयतोऽधिका: |२०|

 

गति-शरीर-परिग्रहाभिमानतो हीना: |२१|

 

पीत-पद्म-शुक्ल-लेश्या द्वि-त्रि-शेषेषु |२२|

 

प्राग्ग्रैवेयकेभ्य: कल्पा: |२३|

 

ब्रह्मलोकालया लौकान्तिका: |२४|

 

सारस्वतादित्य-वह्न्यरुण-गर्दतोय-तुषिताव्याबाधारिष्टाश्च |२५|

 

विजयादिषु द्विचरमा: |२६|

 

औपपादिक-मनुष्येभ्य: शेषास्तिर्यग्योनय: |२७|

 

स्थितिरसुर-नाग-सुपर्ण-द्वीप-शेषाणां सागरोपम-त्रिपल्योपमार्द्धहीनमिता: |२८|

 

सौधर्मैशानयो: सागरोपमेऽधिके |२९|

 

सानत्कुमार-माहेन्द्रयो: सप्त |३०|

 

त्रि-सप्त-नवैकादश-त्रयोदश-पंचदशभिरधिकानि तु |३१|

 

आरणाच्युतादूर्व्nमेकैकेन नवसु ग्रैवेयकेषु विजयादिषु सर्वार्थसिद्धौ च |३२|

 

अपरा पल्योपममधिकम् |३३|

 

परत: परत: पूर्वापूर्वाऽनन्तरा |३४|

 

नारकाणां च द्वितीयादिषु |३५|

 

दशवर्षसहस्राणि प्रथमायाम् |३६|

 

भवनेषु च |३७|

 

व्यन्तराणां च |३८|

 

परा पल्योपममधिकम् |३९|

 

ज्योतिष्काणां च |४०|

 

तदष्टभागोऽपरा |४१|

 

लौकान्तिकानामष्टौ सागरोपमाणि सर्वेषाम् ||४२||

 

।। इति तत्त्वार्थसूत्रे मोक्षशास्त्रे चतुर्थोऽध्याय: ।।४।।

| | अध्याय - ५  | |

अजीवकाया धर्माधर्माकाशपुद्गला: |१|

 

द्रव्याणि |२|

 

जीवाश्च |३|

 

नित्यावस्थितान्यरूपाणि |४|

 

रूपिण: पुद्गला: |५|

 

आ आकाशादेकद्रव्याणि |६|

 

निष्क्रियाणि च |७|

 

असंख्येया: प्रदेशा धर्माधर्मैकजीवानाम् |८|

 

आकाशस्यानन्ता: |९|

 

संख्येयासंख्येयाश्च पुद्गलानाम् |१०|

 

नाणो: |११|

 

लोकाकाशेऽवगाह: |१२|

 

धर्माधर्मयो: कृत्स्ने |१३|

 

एकप्रदेशादिषु भाज्य: पुद्गलानाम् |१४|

 

असंख्येय भागादिषु जीवानाम् |१५|

 

प्रदेशसंहार-विसर्पाभ्यां प्रदीपवत् |१६|

 

गति-स्थित्युपग्रहौ धर्माधर्मयोरुपकार: |१७|

 

आकाशस्यावगाह: |१८|

 

शरीर-वाड़्-मन:-प्राणापाना: पुद्गलानाम् |१९|

 

सुख-दु:ख-जीवितमरणोपग्रहाश्च |२०|

 

परस्परोग्रहो जीवानाम् |२१|

 

वर्तना-परिणाम-क्रिया: परत्वापरत्वे च कालस्य |२२|

 

स्पर्श-रस-गन्ध-वर्णवन्त: पुद्गला: |२३|

 

शब्द-बन्ध-सौक्ष्म्य-स्थौल्य-संस्थान-भेद-तमश्छायातपोद्योतवन्तश्च |२४|

 

अणव: स्कन्धाश्च |२५|

 

भेद-संघातेभ्य: उत्पद्यन्ते |२६|

 

भेदादणु: |२७|

 

भेद-संघाताभ्यां चाक्षुष: |२८|

 

सद् द्रव्य-लक्षणम् |२९|

 

उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य-युक्तं सत् |३०|

 

तद्भावाव्ययं नित्यम् |३१|

 

अर्पितानर्पितसिद्धे: |३२|

 

स्निग्ध-रूक्षत्वाद् बन्ध: |३३|

 

न जघन्यगुणानाम् |३४|

 

गुणसाम्ये सदृशानाम् |३५|

 

द्वयधिकादि-गुणानां तु |३६|

 

बन्धेऽधिकौ पारिणामिकौ च |३७|

 

गुणपर्ययवद् द्रव्यम् |३८|

 

कालश्च |३९|

 

सोऽनन्तसमय: |४०|

 

द्रव्याश्रया निर्गुणा गुणा: |४१|

 

तद्भाव: परिणाम: |४२|

 

।। इति तत्त्वार्थसूत्रे मोक्षशास्त्रे पंचमोऽध्याय: ।।५।।

| | अध्याय - ६  | |

काय-वाड़्-मन: कर्मयोग: |१|

 

स आस्रव: |२|

 

शुभ: पुण्यस्याशुभ: पापस्य |३|

 

सकषायाकषाययो: साम्परायिकेर्यापथयो: |४|

 

इन्द्रिय-कषायाव्रत-क्रिया: पंच-चतु:-पंच-पंचविंशतिसंख्या: पूर्वस्य भेदा: |५|

 

तीव्र-मन्द-ज्ञाताज्ञात-भावाधिकरण-वीर्य-विशेषेभ्यस्तद्विशेष: |६|

 

अधिकरणं जीवाजीवा: |७|

 

आद्यं संरम्भ-समारम्भारम्भ-योग-कृत-कारितानुमत-कषाय-विशेषैस्त्रिस्त्रिस्त्रिश्चतुश्चैकश: |८|

 

निर्वर्तना-निक्षेप-संयोग-निसर्गा द्वि-चतुर्द्वित्रिभेदा: परम् |९|

 

तत्प्रदोष-निह्नव- मात्सर्यान्तरायासादनोपघाता ज्ञान-दर्शनावरणयो: |१०|

 

दु:ख-शोक-तापाक्रन्दन-वध-परिदेवनान्यात्म-परोभयस्थान्यसद्वेद्यस्य |११|

 

भूत-व्रत्यनुकम्पा-दान-सरागसंयमादि-योग:क्षांति: शौचमिति सद्वेद्यस्य |१२|

 

केवलि-श्रुत-संघ-धर्म-देवावर्णवादो दर्शनमोहस्य |१३|

 

कषायोदयात्तीव्रपरिणामश्चारित्रमोहस्य |१४|

 

बह्वारम्भपरिग्रहत्वं नारकस्यायुष: |१५|

 

माया तैर्यग्योनस्य |१६|

 

अल्पारम्भ-परिग्रहत्वं मानुषस्य |१७|

 

स्वभावमार्दवं च |१८|

 

नि:शील-व्रतत्वं च सर्वेषाम् |१९|

 

सरागसंयम-संयमासंयमाकाम-निर्जरा-बालतपांसि दैवस्य |२०|

 

सम्यक्त्वं च |२१|

 

योगवक्रता विसंवादनं चाशुभस्य नाम्न: |२२|

 

तद्विपरीतं शुभस्य |२३|

 

दर्शन-विशुद्धिर्विनयसम्पत्रता-शीलव्रतेष्वनतीचारोऽभीक्ष्णज्ञानोपयोग-संवेगौ-शक्तितस्त्याग-तपसी-साधुसमाधिर्वैयावृत्यकरणमर्हदाचार्य-बहुश्रुत-प्रवचनभक्तिरावश्यका -परिहाणिर्मार्गप्रभावना-प्रवचनवत्सलत्वमिति तीर्थंकरत्वस्य |२४|

 

परात्म-निन्दा-प्रशंसे सदसद्गुणोच्छादनोद्भावने च नीचैर्गोत्रस्य |२५|

 

तद्विपर्ययो नीचैर्वृत्त्यनुत्सेकौ चोत्तरस्य |२६|

 

विघ्नकरणमन्तरायस्य |२७|

 

।। इति तत्त्वार्थसूत्रे मोक्षशास्त्रे षष्ठोऽध्याय: ।।६।।

| | अध्याय - ७  | |

हिंसाऽनृतस्तेयाब्रह्मपरिग्रहेभ्यो विरतिर्व्रतम् |१|

 

देश-सर्वतोऽणुमहती |२|

 

तत्स्थैर्यार्थं भावना: पंच पंच |३|

 

वाङ्मनोगुप्तीर्यादाननिक्षेपण-समित्यालोकितपान-भोजनानि पंच |४|

 

क्रोध-लोभ-भीरुत्व-हास्य-प्रत्याख्यानान्यनुवीचिभाषणं च पंच |५|

 

शून्यागार-विमोचितावास-परोपरोधाकरण-भैक्ष्यशुद्धि- सद्धर्माविसंवादा: पञ्च |६|

 

स्त्रीरागकथाश्रवण-तन्मनोहरांगनिरीक्षण-पूर्वरतानुस्मरण-वृष्येष्टरस-स्वशरीरसंस्कार-त्यागा: पञ्च |७|

 

मनोज्ञामनोज्ञेन्द्रियविषय-राग-द्वेषवर्जनानि पञ्च |८|

 

हिंसादिष्विहामुत्रापायावद्यदर्शनम् |९|

 

दु:खमेव वा |१०|

 

मैत्री-प्रमोद-कारुण्य-माध्यस्थानि च सत्त्व-गुणाधिक-क्लिश्यमानाविनेयेषु |११|

 

जगत्कायस्वभावौ वा संवेग-वैराग्यार्थम् |१२|

 

प्रमत्तयोगात्प्राणव्यपरोपणं हिंसा |१३|

 

असदभिधानमनृतम् |१४|

 

अदत्तादानं स्तेयम् |१५|

 

मैथुनमब्रह्म |१६|

 

मूर्छाah परिग्रह: |१७|

 

नि:शल्यो व्रती |१८|

 

अगार्यनगारश्च |१९|

 

अणुव्रतोऽगारी |२०|

 

दिग्देशानर्थदण्डविरति-सामायिक-प्रोषधोपवासोपभोग-परिभोगपरिमाणातिथिसंविभागव्रत-सम्पन्नश्च |२१|

 

मारणान्तिकीं सल्लेखनां जोषिता |२२|

 

शंका-कांक्षा-विचिकित्साऽन्यदृष्टिप्रशंसा-संस्तवा: सम्यग्दृष्टेरतीचारा: |२३|

 

व्रतशीलेषु पञ्च पञ्च यथाक्रमम् |२४|

 

बन्ध-वधच्छेदातिभारारोपणान्नपाननिरोधा: |२५|

 

मिथ्योपदेश-रहोभ्याख्यान-कूटलेखक्रिया-न्यासापहार-साकारमन्त्रभेदा: |२६|

 

स्तेनप्रयोग-तदाहृतादान-विरुद्धराज्यातिक्रम-हीनाधिकमानोन्मान-प्रतिरूपकव्यवहारा: |२७|

 

परविवाहकरणेत्वरिका-परिगृहीतापरिगृहीतागमनानंगक्रीडा-कामतीव्राभिनिवेशा: |२८|

 

क्षेत्र-वास्तु-हिरण्य-सुवर्ण-धन-धान्य-दासी-दास-कुप्यप्रमाणातिक्रमा: |२९|

 

ऊर्ध्वाधस्तिर्यग्व्यतिक्रम-क्षेत्रवृद्धि-स्मृत्यंतराधानानि |३०|

 

आनयन-प्रेष्यप्रयोग-शब्द-रूपानुपात-पुद्गलक्षेपा: |३१|

 

कन्दर्प-कौत्कुच्य-मौखर्या-समीक्ष्याधिकरणोपभोगपरिभोगानर्थक्यानि |३२|

 

योग-दुष्प्रणिधानानादर-स्मृत्यनुपस्थानानि |३३|

 

अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितोत्सर्गादान-संस्तरोपक्रमणानादर-स्मृत्यनुपस्थानानि |३४|

 

सचित्त-संबंध-सम्मिश्राभिषव-दु:पक्वाहारा: |३५|

 

सचित्तनिक्षेपापिधान- परव्यपदेश-मात्सर्यकालातिक्रमा: |३६|

 

जीवित-मरणाशंसा-मित्रानुराग-सुखानुबन्ध-निदानानि |३७|

 

अनुग्रहार्थं स्वस्यातिसर्गो दानम् |३८|

 

विधि-द्रव्य-दातृ-पात्र-विशेषात्तद्विशेष: |३९|

 

।। इति तत्त्वार्थसूत्रे मोक्षशास्त्रे सप्तमोऽध्याय: ।।७।।

| | अध्याय - ८  | |

मिथ्यादर्शनाविरति-प्रमाद-कषाय-योगा बन्धहेतव: |१|

 

सकषायत्वाज्जीव: कर्मणो योग्यान् पुद्गलानादत्ते स बन्ध: |२|

 

प्रकृति-स्थित्यनुभाग-प्रदेशास्तद्विधय: |३|

 

आद्यो ज्ञानदर्शनावरण-वेदनीय-मोहनीयायुर्नाम-गोत्रान्तराया: |४|

 

पञ्च-नव-द्वयष्टाविंशति-चतुर्द्वि-चत्वारिंशद् द्वि-पञ्चभेदा यथाक्रमम् |५|

 

मति-श्रुतावधि-मन:पर्यय-केवलानाम् |६|

 

चक्षुरचक्षुरवधि-केवलानां निद्रा-निद्रानिद्रा-प्रचला-प्रचलाप्रचला –स्त्यानगृद्धयश्च |७|

 

सदसद्वेद्ये |८|

 

दर्शन-चारित्र-मोहनीयाकषायकषाय-वेदनीयाख्यास्त्रिद्वि-नव-षोडशभेदा: सम्यक्त्व-मिथ्यात्व-तदुभयान्यकषाय-कषायौ हास्य-रत्यरति-शोक-भय-जुगुप्सा-स्त्री-पुन्नपुंसकवेदा अनन्तानु-

बन्ध्यप्रत्याख्यानप्रत्याख्यान-संज्वलन-विकल्पाश्चैकश: क्रोध मान-माया-लोभा: |९|

 

नारकतैर्यग्योन-मानुष-दैवानि |१०|

 

गति-जाति-शरीरांगोपांग-निर्माण-बन्धन-संघात-संस्थान- संहनन-स्पर्श-रस-गन्ध-वर्णानुपूर्व्यागुरुलघूपघात-परघातातपोद्योतोच्वा्धस-विहायोगतय: प्रत्येकशरीर-त्रस-सुभग-सुस्वर-शुभ-सूक्ष्म-पर्याप्ति-स्थिरादेय-यश:कीर्ति-सेतराणि तीर्थंकरत्वं च |११|

 

उच्चैर्नीचैश्च |१२|

 

दान-लाभ-भोगोपभोग-वीर्याणाम् |१३|

 

आदितस्तिसृणामंतरायस्य च त्रिंशत्सागरोपम-कोटीकोट्य: परा स्थिति: |१४|

 

सप्ततिर्मोहनीयस्य |१५|

 

विंशतिर्नामगोत्रयो: |१६|

 

त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाण्यायुष: |१७|

 

अपरा द्वादश मुहूर्ता वेदनीयस्य |१८|

 

नामगोत्रयोरष्टौ |१९|

 

शेषाणामन्तर्मुहूर्ता |२०|

 

विपाकोऽनुभव: |२१|

 

स यथानाम |२२|

 

ततश्च निर्जरा |२३|

 

नामप्रत्यया: सर्वतो योगविशेषात्-सूक्ष्मैकक्षेत्रावगाहस्थिता: सर्वात्मप्रदेशेष्वनन्तानन्तप्रदेशा: |२४|

 

सद्वेद्य-शुभायुर्नाम-गोत्राणि पुण्यम् |२५|

 

अतोऽन्यत्पापम् |२६|

 

।। इति तत्वार्थसूत्रे मोक्षशास्त्रे अष्टमोऽध्याय: ।।८।।

| | अध्याय - ९  | |

आस्रव-निरोध: संवर: |१|

 

स गुप्ति-समिति-धर्मानुप्रेक्षा-परीषहजय-चारित्रै: |२|

 

तपसा निर्जरा च |३|

 

सम्यग्योगनिग्रहो गुप्ति: |४|

 

ईर्या-भाषैषणादान-निक्षेपोत्सर्गा: समितय: |५|

 

उत्तमक्षमा-मार्दवार्जव-शौच-सत्य-संयम-तपस्त्यागाकिंचन्य-ब्रह्मचर्याणि धर्म: |६|

 

अनित्याशरण-संसारैकत्वान्यत्वाशुच्यास्रव-संवर-निर्जरा-लोक-बोधिदुर्लभ-धर्मस्वाख्यातत्त्वानुचिन्तनमनुप्रेक्षा: |७|

 

मार्गाच्च्यवन-निर्जरार्थं परिषोढव्या: परीषहा: |८|

 

क्षुत्पिपासा-शीतोष्णदंशमशक-नाग्न्यारति-स्त्री-चर्या-निषद्या-शय्याक्रोश-वध-याचना-ऽलाभ-रोग-तृणस्पर्श-मल-सत्कारपुरस्कार-प्रज्ञाऽज्ञानादर्शनानि |९|

 

सूक्ष्मसाम्पराय-छद्मस्थवीतरागयोश्चतुर्दश |१०|

 

एकादश जिने |११|

 

बादरसाम्पराये सर्वे |१२|

 

ज्ञानावरणे प्रज्ञाऽज्ञाने |१३|

 

दर्शनमोहान्तराययोरदर्शनाभौ |१४|

 

चारित्रमोहे नाग्न्यारति-स्त्री-निषद्याक्रोश-याचना-सत्कारपुरस्कारा: |१५|

 

वेदनीये शेषा: |१६|

 

एकादयो भाज्या युगपदेकस्मिन्नैकोनविंशते: |१७|

 

सामायिकच्छेदोपस्थापना-परिहारविशुद्धि-सूक्ष्मसाम्पराय-यथाख्यातमिति चारित्रम् |१८|

 

अनशनावमौदर्य-वृत्तिपरिसंख्यान-रसपरित्याग-विविक्तशय्यासन-कायक्लेशा बाह्यं तप: |१९|

 

प्रायश्चित्त-विनय-वैयावृत्त्य-स्वाध्याय-व्युत्सर्ग-ध्यानान्युत्तरम् |२०|

 

नव-चतुर्दश-पंचद्विभेदा यथाक्रमं प्राग्ध्यानात् |२१|

 

आलोचना-प्रतिक्रमण-तदुभय-विवेक-व्युत्सर्ग-तपश्छेद-परिहारोपस्थापना: |२२|

 

ज्ञान-दर्शन-चारित्रोपचारा: |२३|

 

आचार्योपाध्याय-तपस्वि-शैक्ष्य-ग्लान-गण-कुल-संघ-साधु-मनोज्ञानाम् |२४|

 

वाचना-पृच्छनानुप्रेक्षाम्नाय-धर्मोपदेशा: ||२५||

 

बाह्याभ्यन्तरोपध्यो: |२६|

 

उत्तमसंहननस्यैकाग्रचिन्तानिरोधो ध्यानमान्तर्मुहूर्तात् |२७|

 

आर्त्त-रौद्र-धर्य्i-शुक्लानि |२८|

 

परे मोक्षहेतू |२९|

 

आर्त्तममनोज्ञस्य संप्रयोगे तद्विप्रयोगाय स्मृति-समन्वाहार: |३०|

 

विपरीतं मनोज्ञस्य |३१|

 

वेदनायाश्च |३२|

 

निदानं च |३३|

 

तदविरत-देशविरत-प्रमत्तसंयतानाम् |३४|

 

हिंसाऽनृत-स्तेय-विषयसंरक्षणेभ्यो रौद्रमविरत-देशविरतयो: |३५|

 

आज्ञापाय-विपाक-संस्थान-विचयाय धर्य्रम् |३६|

 

शुक्ले चाद्ये पूर्वविद: |३७|

 

परे केवलिन: |३८|

 

पृथक्त्वैकत्ववितर्क- सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति-व्युपरतक्रियानिवर्तीनि |३९|

 

त्र्येकयोग-काय-योगायोगानाम् |४०|

 

एकाश्रये सवितर्क-वीचारे पूर्वे |४१|

 

अवीचारं द्वितीयम् |४२|

 

वितर्क: श्रुतम् |४३|

 

वीचारोऽर्थ-व्यंजन-योगसंक्रान्ति: |४४|

 

vसम्यग्दृष्टि-श्रावक-विरतानन्त-वियोजक-दर्शनमोहक्षपकोपशमकोपशान्तमोह-क्षपक- क्षीणमोह-जिना: क्रमशोऽसंख्येयगुण निर्जरा: |४५|

पुलाक-बकुश-कुशील-निर्ग्रन्थ-स्नातका निर्गन्था: |४६|

 

संयम-श्रुत-प्रतिसेवना-तीर्थ-लिंग-लेश्योपपाद-स्थान-विकल्पत: साध्या: |४७|

 

।। इति तत्वार्थसूत्रे मोक्षशास्त्रे नवमोऽध्याय: ।।९।।

| | अध्याय - १०  | |

मोहक्षयाज्ज्ञान-दर्शनावरणान्तराय-क्षयाच्च केवलम् |१|

 

बन्धहेत्वभावनिर्जराभ्यां कृत्स्न-कर्म-विप्रमोक्षो मोक्ष:|२|

 

औपशमिकादि-भव्यत्वानां च |३|

 

अन्यत्र केवल-सम्यक्त्व-ज्ञान-दर्शन-सिद्धत्वेभ्य: |४|

 

तदनन्तरमूर्ध्वं गच्छत्यालोकान्तात् |५|

 

पूर्वप्रयोगादसंगत्वाद् बन्धच्छेदात्तथागतिपरिणामाच्च |६|

 

आविद्धकुलालचक्रवद् व्यपगतलेपालाबुवदेरण्डबीजवदग्निशिखावच्च |७|

 

धर्मास्तिकायाभावात् |८|

 

क्षेत्र-काल-गति-लिंग-तीर्थ-चारित्र-प्रत्येकबुद्धबोधित-ज्ञानावगाहनान्तर-संख्याल्पबहुत्वत: साध्या: |९|

 

।। इति तत्त्वार्थसूत्रे मोक्षशास्त्रे दशमोऽध्याय: ।।१०।।

 

अक्षर-मात्रा-पद-स्वर-हीनं,व्यंजन-संधि-विवर्जित-रेफम् |

साधुभिरत्र मम क्षमितव्यं, को न विमुह्यति शास्त्रसमुद्रे ||१||

 

दशाध्याये परिच्छिन्ने, तत्त्वार्थे पठिते सति |

फलं स्यादुपवासस्य, भाषितं मुनिपुंगवै: ||२||

 

तत्त्वार्थसूत्र – कर्त्तारं, गृद्धपिच्छोपलक्षितम् |

वंदे गणीन्द्र – संजातमुमास्वामि – मुनीश्वरम् ||३||

 

पढम-चउक्के पढमं, पंचमए जाणि पुग्गलं तच्च |

छह-सत्तमे हि आस्सव, अट्ठमए बंधणादव्वं ||४||

 

णवमे संवर – णिज्जर, दहमे मोक्खं वियाणेहि |

इह सत्त – तच्च भणिदं, दह – सुत्ते मुणिवरिं देहिं ||५||

 

जं सक्कइ तं कीरइ, जं च ण सक्कइ तहेव सद्दहणं |

सद्दहमाणो जीवो, पावइ अजरामरं ठाणं ||६||

 

तवयरणं वयधरणं, संजम-सरणं च जीव-दया-करणं |

अंते समाहिमरणं, चउगई-दुक्खं णिवारे इ ||७||

 

अरहंत-भासियत्थं, गणहरदेवेहिं गंथियं सव्वं |

पणमामि भत्तिजुत्तो, सुदणाण-महोवयं सिरसा ||८||

 

गुरवो पांतु वो नित्यं, ज्ञान-दर्शन-नायका: |

चारित्रार्णव-गंभीरा: मोक्ष-मार्गोपदेशक:||९||

कोटिशतं द्वादशं चैव, कोट्यो लक्षाण्यशीतिस्त्र्यधिकानि चैव |

पंचाशदष्टौ च सहस्र-संख्यमेतद्श्रुतं पंचपदं नमामि ||१०||

 

।। इति तत्त्वार्थसूत्रापरनाम-तत्त्वार्थासूत्रे मोक्षशास्त्रं समाप्तम् ।।

 - आचार्य उमास्वामी


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'जैन ध्वज' by KISHAN GOLCHHA, image compressed, is licensed under CC BY-SA 4.0

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