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एकीभाव स्तोत्र | Ekibhav Stotra

(दोहा)
 
वादिराज मुनिराज के, चरणकमल चित-लाय |
भाषा एकीभाव की, करूँ स्व-पर सुखदाय ||१||
 
(रोला छन्द, ‘अहो जगत् गुरुदेव’ विनती की चाल में)
 
यो अति एकीभाव भयो मानो अनिवारी |
जो मुझ कर्म प्रबंध करत भव-भव दु:ख भारी ||
ताहि तिहाँरी भक्ति जगत् रवि जो निरवारे |
अब सों और कलेश कौन सो नाहिं विदारे ||१||
 
तुम जिन जोति-स्वरूप दुरित-अँधियारि निवारी |
सो गणेश-गुरु कहें तत्त्व-विद्याधन-धारी ||
मेरे चित्त घर-माँहिं बसो तेजोमय यावत |
पाप-तिमिर अवकाश तहाँ सो क्यों करि पावत ||२||
 
आनंद-आँसू वदन धोयं जो तुम चित आने |
गदगद सुर सों सुयश मंत्र पढ़ि पूजा ठानें ||
ता के बहुविधि व्याधि व्याल चिरकाल निवासी |
भाजें थानक छोड़ देह बांबइ के वासी ||३||
 
दिवि तें आवन-हार भये भवि भाग-उदय बल |
पहले ही सुर आय कनकमय कीन महीतल ||
मनगृह-ध्यान-दुवार आय निवसो जगनामी |
जो सुवरन-तन करो कौन यह अचरज स्वामी ||४||
 
प्रभु सब जग के बिना-हेतु बांधव उपकारी |
निरावरन सर्वज्ञ शक्ति जिनराज तिंहारी ||
भक्ति-रचित मम चित्त सेज नित वास करोगे |
मेरे दु:ख-संताप देख किम धीर धरोगे ||५||
 
भव-वन में चिरकाल भ्रम्यो कछु कहिय न जाई |
तुम थुति-कथा-पियूष-वापिका भाग सों पाई ||
शशि-तुषार घनसार हार शीतल नहिं जा सम |
करत न्हौन ता माँहिं क्यों न भव-ताप बुझे मम ||६||
 
श्री विहार परवाह होत शुचिरूप सकल जग |
कमल कनक आभाव सुरभि श्रीवास धरत पग ||
मेरो मन सर्वंग परस प्रभु को सुख पावे |
अब सो कौन कल्यान जो न दिन-दिन ढिंग आवे ||७||
 
भव-तज सुख-पद बसे काम मद सुभट संहारे |
जो तुमको निरखंत सदा प्रिय दास तिहारे ||
तुम-वचनामृत-पान भक्ति अंजुलि सों पीवें |
तिन्हें भयानक क्रूर रोग-रिपु कैसे छीवें ||८||
 
मानथंभ-पाषाण अन्य-पाषाण पटंतर |
ऐसे और अनेक रतन दीखें जग-अंतर ||
देखत दृष्टि-प्रमान मानमद तुरत मिटावे |
जो तुम निकट न होय शक्ति यह क्यों कर पावे ||९||
 
प्रभु-तन-पर्वत परस पवन उर में निबहे है |
ता सों ततछिन सकल रोग रज बाहिर ह्वे है ||
जा के ध्यानाहूत बसो उर अंबुज माहीं |
कौन जगत् उपकार-करन समरथ सो नाहीं ||१०||
 
जनम-जनम के दु:ख सहे सब ते तुम जानो |
याद किये मुझ हिये लगें आयुध से मानो ||
तुम दयाल जगपाल स्वामि मैं शरन गही है |
जो कुछ करनो होय करो परमान वही है ||११||
 
मरन-समय तुम नाम मंत्र जीवक तें पायो |
पापाचारी श्वान प्रान तज अमर कहायो ||
जो मणिमाला लेय जपे तुम नाम निरंतर |
इन्द्र-सम्पदा लहे कौन संशय इस अंतर ||१२||
 
जो नर निर्मल ज्ञान मान शुचि चारित साधे |
अनवधि सुख की सार भक्ति कूँची नहिं लाँधे ||
सो शिव-वाँछक पुरुष मोक्ष पट केम उघारे |
मोह मुहर दिढ़ करी मोक्ष मंदिर के द्वारे ||१३||
 
शिवपुर केरो पंथ पाप-तम सों अति छायो |
दु:ख-सरूप बहु कूप-खाई सों विकट बतायो ||
स्वामी सुख सों तहाँ कौन जन मारग लागे |
प्रभु-प्रवचन मणि दीप जोन के आगे-आगे ||१४||
 
कर्म पटल भू माहिं दबी आतम निधि भारी |
देखत अतिसुख होय विमुख जन नाहिं उघारी ||
तुम सेवक ततकाल ताहि निहचे कर धारे|
थुति कुदाल सों खोद बंद भू कठिन विदारे ||१५||
 
स्याद्वाद-गिरि उपजि मोक्ष सागर लों धाई |
तुम चरणांबुज परस भक्ति गंगा सुखदाई ||
मो चित निर्मल थयो न्होन रुचि पूरव ता में |
अब वह हो न मलीन कौन जिन संशय या में ||१६||
 
तुम शिव सुखमय प्रगट करत प्रभु चिंतन तेरो |
मैं भगवान् समान भाव यों वरते मेरो ||
यदपि झूठ है तदपि तृप्ति निश्चल उपजावे |
तुव प्रसाद सकलंक जीव वाँछित फल पावे ||१७||
 
वचन जलधि तुम देव सकल त्रिभुवन में व्यापे |
भंग-तरंगिनि विकथ-वाद-मल मलिन उथापें ||
मन सुमेरु सों मथें ताहि जे सम्यग्ज्ञानी |
परमामृत सों तृपत होहिं ते चिरलों प्रानी ||१८||
 
जे कुदेव छविहीन वसन-भूषन अभिलाखें |
वैरी सों भयभीत होंय सो आयुध राखें ||
तुम सुन्दर सर्वांग शत्रु समरथ नहिं कोई |
भूषन वसन गदादि ग्रहन काहे को होई ||१९||
 
सुरपति सेवा करे कहा प्रभु प्रभुता तेरी |
सो सलाघना लहे मिटे जग सों जग फेरी ||
तुम भव जलधि जिहाज तोहि शिव कंत उचरिये |
तुही जगत् जनपाल नाथ थुति की थुति करिये ||२०||
 
वचन जाल जड़रूप आप चिन्मूरति झाँई |
ता तें थुति आलाप नाहिं पहुँचे तुम थाहीं ||
तो भी निरफ़ल नाहिं भक्तिरस भीने वायक |
संतन को सुर तरु समान वाँछित वरदायक ||२१||
 
कोप कभी नहिं करो प्रीति कबहूँ नहिं धारो |
अति उदास बेचाह चित्त जिनराज तिहारो ||
तदपि आन जग बहे बैर तुम निकट न लहिये |
यह प्रभुता जगतिलक कहाँ तुम बिन सरदहिये ||२२|
 
सुरतिय गावें सुजश सर्वगत-ज्ञानस्वरूपी |
जो तुमको थिर होहिं नमे भवि आनंदरूपी ||
ताहि छेमपुर चलन वाट बाकी नहिं हो हे |
श्रुत के सुमिरन माँहिं सो न कबहूँ नर मोहे ||२३||
 
अतुल चतुष्टयरूप तुम्हें जो चित में धारे |
आदर सों तिहुँकाल माहिं जग थुति विस्तारे ||
सो सुकृत शिवपंथ भक्ति रचना कर पूरे |
पंच कल्यानक ऋद्धि पाय निहचे भव चूरे ||२४||
 
अहो जगत्पति पूज्य अवधिज्ञानी मुनि हारे |
तुम गुनकीर्तन माहिं कौन हम मंद विचारे ||
थुति छल सों तुम विषे देव आदर विस्तारे |
शिव सुख-पूरनहार कलपतरु यही हमारे ||२५||
 
वादिराज मुनि तें अनु, वैयाकरणी सारे |
वादिराज मुनि तें अनु, तार्किक विद्या वारे ||
वादिराज मुनि तें अनु, हैं काव्यनि के ज्ञाता |
वादिराज मुनि तें अनु, हैं भविजन के त्राता ||२६||
 
(दोहा)
 
मूल अर्थ बहुविधि कुसुम, भाषा सूत्र मँझार |
भक्ति माल ‘भूधर’ करी, करो कंठ सुखकार ||

Image source:
'Jainism' by Chainwit Dhanasarnsombat, image compressed, is licensed under CC BY-SA 4.0

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